श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 35: युधिष्ठिर और अभिमन्युका संवाद तथा व्यूहभेदनके लिये अभिमन्युकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  7.35.24 
अभिमन्युरुवाच
अहमेतत् प्रवेक्ष्यामि द्रोणानीकं दुरासदम्।
पतङ्ग इव संक्रुद्धो ज्वलितं जातवेदसम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
अभिमन्यु ने कहा, "जिस प्रकार चील जलती हुई आग में कूद जाती है, उसी प्रकार मैं भी क्रोध में आकर द्रोणाचार्य की दुर्गम सेना में प्रवेश करूँगा।"
 
Abhimanyu said, "Just as a kite jumps into a burning fire, in the same way, in anger, I too shall enter the inaccessible military array of Dronacharya."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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