श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 35: युधिष्ठिर और अभिमन्युका संवाद तथा व्यूहभेदनके लिये अभिमन्युकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.35.12 
अशक्यं तु तमन्येन द्रोणं मत्वा युधिष्ठिर:।
अविषह्यं गुरुं भारं सौभद्रं समवासृजत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
इस समय द्रोणाचार्य का सामना करना किसी अन्य के लिए असम्भव जानकर युधिष्ठिर ने वह भारी एवं महान् भार सुभद्राकुमार अभिमन्यु पर डाल दिया ॥12॥
 
At this time, considering it impossible for anyone else to face Dronacharya, Yudhishthira placed that heavy and great burden on Subhadrakumar Abhimanyu. 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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