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mahabharat 7.33.9: आपने प्रसन्न होकर पहले मुझे वरदान दिया और फिर उसे उलट दिया; परन्तु महापुरुष अपने भक्त की आशा को कभी निराश नहीं करते ॥9॥   |   mahabharat अध्याय 7.33: दुर्योधनका उपालम्भ, द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा और अभिमन्युवधके वृत्तान्तका संक्षेपसे वर्णन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका उपालम्भ, द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा और अभिमन्युवधके वृत्तान्तका संक्षेपसे वर्णन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  7.33.9 
वरं दत्त्वा मम प्रीत: पश्चाद् विकृतवानसि।
आशाभङ्गं न कुर्वन्ति भक्तस्यार्या: कथंचन॥ ९॥
 
 
अनुवाद
आपने प्रसन्न होकर पहले मुझे वरदान दिया और फिर उसे उलट दिया; परन्तु महापुरुष अपने भक्त की आशा को कभी निराश नहीं करते ॥9॥
 
"You were pleased and first granted me a boon and then reversed it; but a great man never disappoints the hopes of his devotee." ॥9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)