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श्लोक 7.33.28  |
दावाग्न्यभिपरीतानां भूरिगुल्मतृणद्रुमे।
वनौकसामिवारण्ये त्वदीयानामभूद् भयम्॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे प्रचुर लताओं, घासों और वृक्षों से युक्त वन में दावानल से घिरे हुए वनवासियों को महान भय होता है, उसी प्रकार आपके सैनिक अभिमन्यु से अत्यन्त भयभीत हो गए थे॥ 28॥ |
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| Just as forest dwellers face great fear when they are surrounded by a forest fire in a forest full of abundant creepers, grass and trees, similarly your soldiers were greatly frightened by Abhimanyu.॥ 28॥ |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युवधसंक्षेपकथने त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युवधका संक्षेपसे वर्णनविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥
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