श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका उपालम्भ, द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा और अभिमन्युवधके वृत्तान्तका संक्षेपसे वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  7.33.27 
विक्रीडितं कुमारेण यथानीकं बिभित्सता।
आरुग्णाश्च यथा वीरा दु:साध्याश्चापि विप्लवे॥ २७॥
 
 
अनुवाद
मैं आपको बता रहा हूँ कि कुमार अभिमन्यु ने आपकी सेना की व्यूहरचना को भेदने की इच्छा से युद्धभूमि में किस प्रकार युद्ध किया और उस प्रलयंकारी संग्राम में किस प्रकार अजेय योद्धाओं के भी पैर उखाड़ डाले॥ 27॥
 
I am telling you about the way in which Kumar Abhimanyu fought the battle field with the desire to break through the formation of your army and how he uprooted the feet of even the most invincible warriors in that devastating battle.॥ 27॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas