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श्लोक 7.33.14  |
तं च व्यूहं विधास्यामि योऽभेद्यस्त्रिदशैरपि।
योगेन केनचिद् राजन्नर्जुनस्त्वपनीयताम्॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! आज मैं ऐसी व्यूह रचना करूँगा जिसे देवता भी नहीं तोड़ सकेंगे; किन्तु आप कृपा करके किसी प्रकार अर्जुन को यहाँ से हटा दीजिए॥14॥ |
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| King! Today I will create a formation which even the gods cannot break; but please remove Arjuna from here by some means.॥ 14॥ |
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