श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 32: कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध,भीमसेनका कौरव महारथियोंके साथ संग्राम, भयंकर संहार, पाण्डवोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, अर्जुन और कर्णका युद्ध, कर्णके भाइयोंका वध तथा कर्ण और सात्यकिका संग्राम  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  7.32.80 
ततो बले भृशलुलिते परस्परं
निरीक्षमाणे रुधिरौघसम्प्लुते।
दिवाकरेऽस्तंगिरिमास्थिते शनै-
रुभे प्रयाते शिबिराय भारत॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
हे भारतपुत्र! दोनों ओर की सेनाएँ बुरी तरह घायल और रक्त से लथपथ एक-दूसरे को देख रही थीं। इसी बीच सूर्यदेव पश्चिम दिशा में पहुँच गए। तब दोनों सेनाएँ धीरे-धीरे अपने-अपने शिविरों की ओर चल पड़ीं।
 
O son of Bharat! The armies of both sides were looking at each other, badly wounded and covered in blood. Meanwhile, the Sun God reached the west. Then both the armies slowly headed towards their respective camps.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि द्वादशदिवसावहारे द्वात्रिंशोऽध्याय:॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें बारहवें दिनके युद्धमें सेनाका युद्धसे विरत हो अपने शिविरको प्रस्थानविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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