श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 32: कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध,भीमसेनका कौरव महारथियोंके साथ संग्राम, भयंकर संहार, पाण्डवोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, अर्जुन और कर्णका युद्ध, कर्णके भाइयोंका वध तथा कर्ण और सात्यकिका संग्राम  »  श्लोक 66-67h
 
 
श्लोक  7.32.66-67h 
तत: स्वरथमास्थाय पाञ्चाल्योऽन्यच्च कार्मुकम्॥ ६६॥
आदाय कर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या नदन् रणे।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् पांचाल नरेश धृष्टद्युम्न ने रथ पर बैठकर दूसरा धनुष उठाया और युद्धभूमि में गर्जना करते हुए तिहत्तर बाणों से कर्ण को घायल कर दिया।
 
Thereafter Dhrishtadyumna, the prince of Panchala, seated himself in his chariot, took up another bow, roaring in the battlefield, and pierced Karna with seventy-three arrows. 66 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)