श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 31: कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध तथा अश्वत्थामाके द्वारा राजा नीलका वध  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.31.15 
घूर्णतोऽपि बलौघस्य दिवं स्तब्ध्वेव नि:स्वन:।
अजातशत्रोस्तत्सैन्यमाविवेश सुभैरव:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सब दिशाओं में चलती हुई सेना का अत्यन्त भयानक शब्द मानो आकाश को स्तब्ध कर गया और बेताज राजा युधिष्ठिर की सारी सेना में फैल गया ॥15॥
 
There, the extremely terrifying noise of the army moving in all directions, as if stunned the sky, and spread throughout the army of Yudhishthira, the uncrowned king. ॥15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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