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श्लोक 7.3.25  |
तमद्याहं पाण्डवं युद्धशौण्ड-
ममृष्यमाणो भवता चानुशिष्ट:।
आशीविषं दृष्टिहरं सुघोरं
शूरं शक्ष्याम्यस्त्रबलान्निहन्तुम्॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| आज यदि आपकी अनुमति हो तो मैं अपने अस्त्रों के बल से अत्यन्त भयंकर और युद्ध में निपुण पाण्डुपुत्र अर्जुन को उसी प्रकार मार डालूँगा, जैसे शत्रुतावश सबकी दृष्टि हर लेने वाला विषैला सर्प मार डालता है।' |
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| Today, if you permit, I shall be able to kill with the power of my weapons, Arjuna, the son of Pandu, who is extremely fearsome and skilled in warfare, like a poisonous serpent who takes away everyone's sight out of enmity.' |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि कर्णवाक्ये तृतीयोऽध्याय:॥ ३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेक पर्वमें कर्णवाक्यविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ ३॥
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