श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 3: भीष्मजीके प्रति कर्णका कथन  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  7.3.2-3 
दृष्ट्वा पितामहं भीष्मं सर्वक्षत्रान्तकं गुरुम्।
दिव्यैरस्त्रैर्महेष्वासं पातितं सव्यसाचिना॥ २॥
जयाशा तव पुत्राणां सम्भग्ना शर्म वर्म च।
अपाराणामिव द्वीपमगाधे गाधमिच्छताम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
समस्त क्षत्रियों का संहार करने में समर्थ गुरु और पितामह महाधनुर्धर भीष्म को सव्यसाची अर्जुन ने अपने दिव्यास्त्रों से मार डाला। उन्हें उस अवस्था में देखकर आपके पुत्रों ने विजय की आशा छोड़ दी। उन्होंने अपने कल्याण की भी आशा छोड़ दी। उनके रक्षा कवच भी टुकड़े-टुकड़े हो गए। जो कौरव कहीं पार नहीं जा सकते थे और अथाह सागर की थाह लेना चाहते थे, उनके लिए भीष्मजी आश्रय के द्वीप के समान थे, जिन्हें पार्थ ने नष्ट कर दिया।॥2-3॥
 
The great bowman Bhishma, the Guru and grandfather capable of killing all the Kshatriyas, was killed by Savyasachi Arjuna with his divine weapons. Seeing him in that state, your sons lost hope of victory. They also lost hope of their welfare. Their protective shields were also torn to pieces. For the Kauravas who could not cross anywhere and wanted to fathom the bottomless ocean, Bhishmaji was like an island of shelter, which was destroyed by Partha.॥2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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