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mahabharat 7.3.10-11h: ‘निश्चय ही इस लोक में कोई भी अपने पुण्यकर्मों का फल यहाँ नहीं भोगता; क्योंकि यद्यपि तुम वृद्धावस्था तक धर्म में तत्पर रहे हो, फिर भी इस अवस्था में पृथ्वी पर सो रहे हो॥ 10 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 7.3: भीष्मजीके प्रति कर्णका कथन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 3: भीष्मजीके प्रति कर्णका कथन  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  7.3.10-11h 
न नूनं सुकृतस्येह फलं कश्चित् समश्नुते॥ १०॥
यत्र धर्मपरो वृद्ध: शेते भुवि भवानिह।
 
 
अनुवाद
‘निश्चय ही इस लोक में कोई भी अपने पुण्यकर्मों का फल यहाँ नहीं भोगता; क्योंकि यद्यपि तुम वृद्धावस्था तक धर्म में तत्पर रहे हो, फिर भी इस अवस्था में पृथ्वी पर सो रहे हो॥ 10 1/2॥
 
‘Certainly no one in this world enjoys the fruits of his pious deeds here; because even though you have remained devoted to Dharma till old age, yet you are sleeping here on the earth in this state.॥ 10 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)