श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 22: द्रोणके युद्धके विषयमें दुर्योधन और कर्णका संवाद  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.22.17 
व्यक्तं द्रोणमयं लोकमद्य पश्यति दुर्मति:।
निराशो जीवितान्नूनमद्य राज्याच्च पाण्डव:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
निश्चय ही आज यह मूर्ख पाण्डुपुत्र अपने जीवन और राज्य से निराश होकर सम्पूर्ण जगत् को द्रोण के समान देख रहा होगा ॥17॥
 
Surely today this foolish son of Pandu, disappointed with his life and kingdom, must be seeing the entire world as Drona-like. ॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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