स मध्यं प्राप्य सैन्यानां सर्वा: प्रविचरन् दिश:।
त्राता ह्यभवदन्येषां न त्रातव्य: कथञ्चन॥ ५४॥
अनुवाद
यद्यपि वे शत्रुओं की सेना में घुसकर सब दिशाओं में विचरण कर रहे थे, तथापि वे दूसरों के रक्षक थे और स्वयं किसी से भी रक्षित नहीं थे ॥ 54॥
Although He had entered the enemy's army and was roaming in all directions, yet He was the protector of others and He Himself was not in any way protected by anyone. ॥ 54॥