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mahabharat 7.201.85: तुम जानो, इस प्रकार श्रीकृष्ण को भगवान शंकर से ये अनेक वरदान प्राप्त हो चुके हैं। वे स्वयं भगवान नारायण श्रीकृष्ण के रूप में अपनी माया से इस जगत को मोहित करते हुए विचरण कर रहे हैं। 85॥   |   mahabharat अध्याय 7.201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  7.201.85 
एवमेते वरा लब्धा: पुरस्ताद् विद्धि शौरिणा।
स एष देवश्चरति मायया मोहयञ्जगत्॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
तुम जानो, इस प्रकार श्रीकृष्ण को भगवान शंकर से ये अनेक वरदान प्राप्त हो चुके हैं। वे स्वयं भगवान नारायण श्रीकृष्ण के रूप में अपनी माया से इस जगत को मोहित करते हुए विचरण कर रहे हैं। 85॥
 
You should know, thus Shri Krishna has already received these many boons from Lord Shankar. He himself is wandering in the form of Lord Narayana Shri Krishna, captivating this world with his illusion. 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)