श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  7.201.8-9 
धृतराष्ट्र उवाच
आचार्यपुत्रो मानार्हो बलवांश्चापि संजय।
प्रीतिर्धनंजये चास्य प्रियश्चापि महात्मन:॥ ८॥
न भूतपूर्वं बीभत्सोर्वाक्यं परुषमीदृशम्।
अथ कस्मात् स कौन्तेय: सखायं रूक्षमुक्तवान्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र ने पूछा- संजय! आचार्यपुत्र अश्वत्थामा बलवान और आदर के योग्य हैं। वे अर्जुन से प्रेम करते हैं और महात्मा अर्जुन को भी प्रिय हैं। अर्जुन के मुख से उनके प्रति ऐसे कठोर वचन पहले कभी नहीं सुने गए। फिर उस दिन कुन्तीकुमार अर्जुन ने अपने मित्र के प्रति ऐसे कठोर वचन क्यों कहे?॥8-9॥
 
Dhritarashtra asked- Sanjay! Acharyaputra Ashwatthama is strong and worthy of respect. He loves Arjuna and he is also dear to the great soul Arjuna. Such harsh words from Arjuna towards him have never been heard before. Then why did Kuntikumar Arjuna say such harsh words towards his friend that day?॥ 8-9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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