श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  7.201.77 
भूतं भव्यं भविता चाप्यधृष्यं
त्वत्सम्भूता भुवनानीह विश्वा।
भक्तं च मां भजमानं भजस्व
मा रीरिषो मामहिताहितेन॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
भूत, वर्तमान, भविष्य और अजेय काल - ये सब आपके ही स्वरूप हैं। यहाँ जितने भी लोक हैं, वे सब आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। मैं आपका भक्त हूँ, आपकी आराधना करता हूँ, कृपया मुझे स्वीकार करें। जो मेरा अनिष्ट करें, उन्हें अपने पास रखें और मेरा अनिष्ट न होने दें।
 
Past, present, future and the invincible time – all these are your manifestations. All the worlds here have originated from you. I am your devotee who worships you, please accept me. Keep those who do harm to me and do not let me be harmed.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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