श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  7.201.76 
दिव्यामृतौ मानसौ द्वौ सुपर्णौ
वाचा शाखा: पिप्पला: सप्त गोपा:।
दशाप्यन्ये ये पुरं धारयन्ति
त्वया सृष्टास्त्वं हि तेभ्य: परो हि॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
अन्तःकरण में दो दिव्य और अमृततुल्य पक्षी (ईश्वर और आत्मा) निवास करते हैं। सात धातुओं के रूप में सात पीपल के वृक्ष हैं, जो उनकी रक्षा करते हैं। वेदों के शब्द उन वृक्षों की विभिन्न शाखाएँ हैं। दस अन्य वस्तुएँ (इन्द्रियाँ) भी हैं, जो पंचतत्व रूपी शरीर को धारण करती हैं। ये सभी वस्तुएँ आपके द्वारा निर्मित हैं, फिर भी आप इन सबसे परे हैं। 76।
 
There are two divine and nectar-like birds (God and soul) residing in the inner mind. There are seven Peepal trees in the form of seven metals, which protect them. The words of Vedas are the various branches of those trees. There are ten other things (senses) too, which support the city of the five-elemental body. All these things are created by you, yet you are beyond them all. 76.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas