| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना » श्लोक 73 |
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| | | | श्लोक 7.201.73  | सुरासुरान् नागरक्ष:पिशाचान्
नरान् सुपर्णानथ गन्धर्वयक्षान्।
पृथग्विधान् भूतसंघांश्च विश्वां-
स्त्वत्सम्भूतान् विद्म सर्वांस्तथैव।
ऐन्द्रं याम्यं वारुणं वैत्तपाल्यं
पैत्रं त्वाष्ट्रं कर्म सौम्यं च तुभ्यम्॥ ७३॥ | | | | | | अनुवाद | | देवता, दानव, नाग, राक्षस, पिशाच, मनुष्य, गरुड़, गंधर्व और यक्ष आदि पक्षी, नाना प्रकार के प्राणियों का सम्पूर्ण समुदाय, हम इन सबको आपसे ही उत्पन्न मानते हैं। इसी प्रकार इन्द्र, यम, वरुण और कुबेर का पद, पितरों का लोक तथा विश्वकर्मा आदि की सुन्दर शिल्पकला भी आपसे ही उत्पन्न हुई है। 73॥ | | | | Gods, demons, snakes, demons, vampires, humans, birds like Garuda, Gandharva and Yaksha, the entire community of different beings, we consider all of them to have originated from you. Similarly, the position of Indra, Yama, Varun and Kuber, the world of ancestors and the beautiful craftsmanship of Vishwakarma etc. have also emerged from you. 73॥ | | ✨ ai-generated | | |
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