श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  7.201.68 
यं पश्यन्ति ब्राह्मणा: साधुवृत्ता:
क्षीणे पापे मनसा वीतशोका:।
तं निष्पतन्तं तपसा धर्ममीड्यं
तद्भक्त्या वै विश्वरूपं ददर्श।
दृष्ट्वा चैनं वाङ्मनोबुद्धिदेहै:
संहृष्टात्मा मुमुदे वासुदेव:॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
जिन्होंने मन से शोक और शोक को सर्वथा दूर कर दिया है, पुण्यात्मा ब्राह्मण पाप नष्ट हो जाने पर भी देख पाते हैं, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत् है, जो प्रत्यक्ष धर्म और स्तुति के योग्य ईश्वर हैं, वही महेश्वर अपनी तपस्या और भक्ति के प्रभाव से वहाँ प्रकट हुए और तपस्वी नारायण ने उन्हें देखा। उन्हें देखकर उनके मन, वाणी, बुद्धि और शरीर के साथ-साथ उनकी अन्तरात्मा भी आनन्द से खिल उठी। उन भगवान वासुदेव को महान आनन्द का अनुभव हुआ॥68॥
 
The one who has completely removed grief and sorrow from the mind, the virtuous Brahmins who are able to see after their sins are destroyed, the one whose form is the entire world, the one who is the visible religion and the God worthy of praise, the same Maheshwar appeared there due to the influence of his penance and devotion and the ascetic Narayan saw him. After seeing him, his mind, speech, intellect and body as well as his inner soul blossomed with joy. That Lord Vasudev experienced great joy. 68॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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