श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  7.201.65 
पिनाकिनं वज्रिणं दीप्तशूलं
परश्वधिं गदिनं चायतासिम्।
शुभ्रं जटिलं मुसलिनं चन्द्रमौलिं
व्याघ्राजिनं परिघिणं दण्डपाणिम्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
वे अपने हाथों में पिनाक और वज्र धारण करते हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल चमकता है। वे एक कुल्हाड़ी, एक गदा और एक लंबी तलवार धारण करते हैं। उनके हाथों में मूसल, गदा और दण्ड भी शोभायमान हैं। उनका शरीर कान्तिमान है। वे अपने सिर पर जटाएँ और उसके ऊपर चन्द्रमा के समान मुकुट धारण करते हैं। उनके शरीर पर व्याघ्रचर्म शोभायमान है ॥ 65॥
 
He holds the Pinaka and the Vajra in his hands. A trident glitters in one of his hands. He carries an axe, a mace and a long sword. The pestle, the club and the staff also adorn his hands. His body is radiant. He wears matted hair on his head and a moon-like crown above it. A tiger skin adorns his body. ॥ 65॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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