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श्लोक 7.201.60  |
अथापरं तपस्तप्त्वा द्विस्ततोऽन्यत् पुनर्महत्।
द्यावापृथिव्योर्विवरं तेजसा समपूरयत्॥ ६०॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् उन्होंने दुगुने समय तक घोर तपस्या की और पृथ्वी तथा आकाश के बीच के स्थान को अपने तेज से भर दिया। |
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| Thereafter he performed intense penance for twice the time and filled the space between the earth and sky with his radiance. |
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