श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  7.201.52-53 
नासुरा न च गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसा:।
न सर्पा यक्षपतगा न मनुष्या: कथंचन॥ ५२॥
उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुमेतदस्त्रं मयेरितम्।
तदिदं केवलं हत्वा शान्तमक्षौहिणीं ज्वलत्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
मेरे द्वारा प्रयुक्त यह अस्त्र दैत्य, गन्धर्व, भूत, पिशाच, सर्प, यक्ष, पक्षी और मनुष्य किसी भी प्रकार से नष्ट नहीं कर सकते थे। फिर भी यह प्रज्वलित अस्त्र केवल एक अक्षौहिणी सेना को जलाकर स्वयं ही बुझ गया॥52-53॥
 
This weapon used by me could not be destroyed by the demons, Gandharvas, ghosts, devils, snakes, Yakshas, ​​birds and humans in any way. Yet this blazing weapon extinguished itself after burning only one Akshauhini army. ॥ 52-53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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