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mahabharat 7.201.47: तत्पश्चात् द्रोणपुत्र ने अपना धनुष त्याग दिया, रथ से कूद पड़े और "मुझे धिक्कार है! मुझे धिक्कार है!! यह सब मिथ्या है" कहते हुए वे पूरी गति से युद्धभूमि से भाग गये।   |   mahabharat अध्याय 7.201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  7.201.47 
ततो द्रौणिर्धनुस्त्यक्त्वा रथात् प्रस्कन्द्य वेगित:।
धिग् धिक् सर्वमिदं मिथ्येत्युक्त्वा सम्प्राद्रवद् रणात्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् द्रोणपुत्र ने अपना धनुष त्याग दिया, रथ से कूद पड़े और "मुझे धिक्कार है! मुझे धिक्कार है!! यह सब मिथ्या है" कहते हुए वे पूरी गति से युद्धभूमि से भाग गये।
 
Thereafter, Drona's son abandoned his bow, jumped from the chariot and saying, "Shame on me! Shame on me!! All this is false", he ran away from the battlefield at full speed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)