श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 201: अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव-सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  7.201.18 
ततस्तुमुलमाकाशे शरवर्षमजायत।
पावकार्चि: परीतं तत् पार्थमेवाभिपुप्लुवे॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तब आकाश से बाणों की भयंकर वर्षा होने लगी और सब ओर से अग्नि की लपटें फैलती हुई अर्जुन पर पड़ने लगीं॥18॥
 
Then a fierce shower of arrows began from the sky and the flames of fire spreading from all sides fell upon Arjuna.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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