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श्लोक 7.2.37  |
हुताशनाभ: स हुताशनप्रभे
शुभ: शुभे वै स्वरथे धनुर्धर:।
स्थितो रराजाधिरथिर्महारथ:
स्वयं विमाने सुरराडिवास्थित:॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| अग्नि के समान तेजस्वी सुन्दर रथ पर बैठकर महारथी, सुन्दर धनुर्धर अधिरथपुत्र कर्ण विमान में बैठे हुए देवराज इन्द्र के समान सुशोभित हो रहे थे ॥37॥ |
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| Sitting on his beautiful chariot, radiant as fire, Adhiratha's son Karna, a great charioteer and a handsome and archer, was adorned like Devraj Indra seated in the plane. 37॥ |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि कर्णनिर्याणे द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें कर्णकी रणयात्राविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं।) |
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