श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 2: कर्णकी रणयात्रा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  7.2.19 
एवं चैषां बाधमान: प्रभावं
गत्वैवाहं ताञ्जयाम्यद्य सूत।
मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं
भग्ने सैन्ये य: समेयात् स मित्रम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
तब कर्ण ने अपने सारथि से कहा, 'शुत! इसी प्रकार मैं युद्ध में जाकर इन शत्रुओं के बढ़ते हुए प्रभाव को नष्ट करके आज ही इन्हें परास्त कर दूँगा। मैं यह सहन नहीं कर सकता कि कोई मेरे मित्रों के साथ विश्वासघात करे। जो सेना के भाग जाने पर भी मेरा साथ दे, वही सच्चा मित्र है।'
 
Then Karna said to his charioteer, 'Shuta! In this way, I will go to war and destroy the growing influence of these enemies and defeat them today. I cannot tolerate anyone betraying my friends. The one who supports me even when the army runs away is a true friend.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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