श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 2: कर्णकी रणयात्रा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.2.15 
अहं तु तान् कुरुवृषभानजिह्मगै:
प्रवेशयन् यमसदनं चरन् रणे।
यश: परं जगति विभाव्य वर्तिता
परैर्हतो भुवि शयिताथवा पुन:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
मैं अपने सीधे बाणों से उन कुरुप्रवर पाण्डवों को यमलोक भेज दूँगा और रणभूमि में घूम-घूमकर संसार में महान यश फैलाऊँगा अथवा शत्रुओं के हाथों मारा जाकर रणभूमि में सदा के लिए सो जाऊँगा॥15॥
 
I will send those Kurupravra Pandavas to Yamalok with my straight arrows and will roam around in the battlefield and spread great fame in the world or after getting killed by the hands of the enemies, I will sleep forever in the battlefield. 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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