श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 198: सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण  »  श्लोक 1-4h
 
 
श्लोक  7.198.1-4h 
धृतराष्ट्र उवाच
साङ्गा वेदा यथान्यायं येनाधीता महात्मना।
यस्मिन् साक्षाद् धनुर्वेदो ह्रीनिषेवे प्रतिष्ठित:॥ १॥
यस्य प्रसादात् कुर्वन्ति कर्माणि पुरुषर्षभा:।
अमानुषाणि संग्रामे देवैरसुकराणि च॥ २॥
तस्मिन्नाक्रुश्यति द्रोणे समक्षं पापकर्मणा।
नीचात्मना नृशंसेन क्षुद्रेण गुरुघातिना॥ ३॥
नामर्षं तत्र कुर्वन्ति धिक् क्षात्रं धिगमर्षिताम्।
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "संजय! जिन महात्मा ने सम्पूर्ण वेदों का विधिपूर्वक अध्ययन किया था, जिन शीलवान महापुरुष में धनुर्वेद प्रतिष्ठित था, जिनकी कृपा से अनेक महारथियों ने युद्धस्थल में ऐसे असाधारण पराक्रम दिखाए, जो देवताओं के लिए भी कठिन थे; उन्हीं द्रोणाचार्य की उस पापी, नीच, क्रूर, क्षुद्र और गुरु-हत्यारे धृष्टद्युम्न ने सबके सामने निन्दा की और लोगों ने तनिक भी क्रोध नहीं किया। ऐसे क्षत्रियों को धिक्कार है! और उनके क्रोधी स्वभाव को धिक्कार है!!॥1-3 1/2॥
 
Dhritarashtra said, "Sanjay! That great soul who had studied the entire Vedas with all its parts methodically, that modest noble soul in whom Dhanurveda was established, by whose grace many great warriors displayed such extraordinary feats in the battlefield, which were difficult even for the Gods; that same Dronacharya was being criticized by that sinful, mean, cruel, petty and Guru-killer Dhrishtadyumna in front of everyone and people did not show any anger. Shame on such Kshatriyas! And shame on their resentful nature!!॥1-3 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)