श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  7.195.45 
मित्रब्रह्मगुरुद्रोही जाल्मक: सुविगर्हित:।
पाञ्चालापसदश्चाद्य न मे जीवन् विमोक्ष्यते॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
वह अत्यन्त निन्दित पांचालकुल कलंक पामर धृष्टद्युम्न, जिसने अपने मित्र, ब्राह्मण और गुरु के साथ विश्वासघात किया है, आज मेरे हाथ से जीवित बचकर नहीं जा सकेगा। 45॥
 
‘That highly condemned Panchalakul Kalank Palmer Dhrishtadyumna, who has betrayed his friend, Brahmin and Guru, will not be able to escape alive from my hands today.’ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)