अथ संख्ये रथस्यैव शस्त्राणां च विसर्जनम्।
प्रयाचतां च शत्रूणां गमनं शरणस्य च॥ ३६॥
एते प्रशमने योगा महास्त्रस्य परंतप।
सर्वथा पीडितो हि स्यादवध्यान् पीडयन् रणे॥ ३७॥
अनुवाद
हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले द्रोण! युद्धस्थल में रथ छोड़कर, शस्त्र रखकर, रक्षा की याचना करके तथा शत्रुओं से शरण लेकर, ये ही इस महान् अस्त्र को शांत करने के उपाय हैं। जो पुरुष युद्धस्थल में इस अस्त्र से अजेय पुरुषों को पीड़ा पहुँचाता है, वह स्वयं भी सब प्रकार से पीड़ित हो सकता है।॥ 36-37॥
‘O Drona, tormentor of enemies! Leaving the chariot on the battlefield, putting down your weapons, pleading for protection and seeking refuge from the enemy – these are the ways to pacify this great weapon. The one who torments the invincible men with this weapon on the battlefield can himself also be tormented in all ways.’॥ 36-37॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥