न हि जानाति बीभत्सुस्तदस्त्रं न जनार्दन:।
न भीमसेनो न यमौ न च राजा युधिष्ठिर:॥ २९॥
न पार्षतो दुरात्मासौ न शिखण्डी न सात्यकि:।
यदिदं मयि कौरव्य सकल्पं सनिवर्तनम्॥ ३०॥
अनुवाद
आज मैं जिस अस्त्र का प्रयोग करूँगा, उसे न तो अर्जुन जानते हैं, न श्रीकृष्ण, न ही भीमसेन, नकुल-सहदेव और न ही राजा युधिष्ठिर। वह दुष्टात्मा धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और सात्यकि भी उसके ज्ञान से रहित हैं। कुरुपुत्र! प्रयोग और संधान सहित वह अस्त्र मेरे पास ही है॥ 29-30॥
‘Today, neither Arjun nor Shri Krishna, Bhimsen, Nakul-Sahdev and King Yudhishthir know about the weapon that I will use. That evil soul Dhrishtadyumna, Shikhandi and Satyaki are also devoid of its knowledge. Son of Kuru! I alone have it along with its use and conclusion.॥ 29-30॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥