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mahabharat 7.195.14-15: कुरुनन्दन! मैं अपने सत्य, इष्ट (यज्ञ-यागादि) और अपूरत (वापि-तड़ाग निर्माण आदि) कर्मों की शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं समस्त पांचालों का वध किए बिना किसी भी प्रकार जीवित नहीं रह सकूँगा। मैं हर प्रकार से पांचालों का वध करने का प्रयत्न करूँगा। 14-15॥   |   mahabharat अध्याय 7.195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 195: अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्‍गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  7.195.14-15 
शपे सत्येन कौरव्य इष्टापूर्तेन चैव ह॥ १४॥
अहत्वा सर्वपाञ्चालान् जीवेयं न कथंचन।
सर्वोपायैर्यतिष्यामि पञ्चालानामहं वधे॥ १५॥
 
 
अनुवाद
कुरुनन्दन! मैं अपने सत्य, इष्ट (यज्ञ-यागादि) और अपूरत (वापि-तड़ाग निर्माण आदि) कर्मों की शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं समस्त पांचालों का वध किए बिना किसी भी प्रकार जीवित नहीं रह सकूँगा। मैं हर प्रकार से पांचालों का वध करने का प्रयत्न करूँगा। 14-15॥
 
Kurunandan! I swear by my truth, Ishta (Yagya-Yagadi) and apurat (Vapi-Tadaag Nirman etc.) deeds that I will not be able to survive in any way without killing all the Panchalas. I will try to kill Panchalas by all means. 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)