श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 193: कौरव-सैनिकों तथा सेनापतियोंका भागना, अश्वत्थामाके पूछनेपर कृपाचार्यका उसे द्रोणवधका वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 55-56
 
 
श्लोक  7.193.55-56 
तमतथ्यभये मग्नो जये सक्तो युधिष्ठिर:।
अश्वत्थामानमायोधे हतं दृष्ट्वा महागजम्॥ ५५॥
भीमेन गिरिवर्ष्माणं मालवस्येन्द्रवर्मण:।
उपसृत्य तदा द्रोणमुच्चैरिदमुवाच ह॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि युधिष्ठिर मिथ्यात्व के भय में डूबे हुए थे, फिर भी उन्हें विजय की अभिलाषा थी। इसलिए मालवीय राजा इन्द्रवर्मा के पर्वत के समान विशाल महान हाथी अश्वत्थामा को युद्धस्थल में भीमसेन द्वारा मारा हुआ देखकर वे द्रोणाचार्य के पास गए और ऊँची वाणी में इस प्रकार बोले -॥55-56॥
 
Even though Yudhishthira was drowned in the fear of falsehood, he was attached to victory. Therefore, seeing the great elephant Ashwatthama of the Malavan king Indravarma, who was of the size of a mountain, killed by Bhimasena on the battlefield, he went to Dronacharya and spoke in a loud voice as follows -॥ 55-56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)