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mahabharat 7.192.53: जब आचार्य द्रोण ने इस प्रकार अपनी दिशा बदली, तब हमें ऐसा अनुभव होने लगा मानो आकाश में दो सूर्य उदय हो गए हों ॥53॥   |   mahabharat अध्याय 7.192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 192: उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  7.192.53 
द्वौ सूर्याविति नो बुद्धिरासीत् तस्मिंस्तथागते॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
जब आचार्य द्रोण ने इस प्रकार अपनी दिशा बदली, तब हमें ऐसा अनुभव होने लगा मानो आकाश में दो सूर्य उदय हो गए हों ॥53॥
 
When Acharya Drona reversed course in that manner, we began to feel as if two suns had risen in the sky. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)