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श्री महाभारत
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पर्व 7: द्रोण पर्व
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अध्याय 190: द्रोणाचार्यका घोर कर्म, ऋषियोंका द्रोणको अस्त्र त्यागनेका आदेश तथा अश्वत्थामाकी मृत्यु सुनकर द्रोणका जीवनसे निराश होना
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श्लोक 57
श्लोक
7.190.57
युधिष्ठिरात् तु तद् वाक्यं श्रुत्वा द्रोणो महारथ:।
पुत्रव्यसनसंतप्तो निराशो जीवितेऽभवत्॥ ५७॥
अनुवाद
युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर महारथी द्रोणाचार्य पुत्र के शोक से दुःखी हो गए और अपने जीवन से निराश हो गए ॥57॥
Hearing these words from Yudhishthir, the great warrior Dronacharya became saddened by the grief of his son and despaired of his life. 57॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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