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श्लोक 7.188.54  |
शरजालै: समाकीर्णे मेघजालैरिवाम्बरे।
नापतच्च तत: कश्चिदन्तरिक्षचरस्तदा॥ ५४॥ |
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| अनुवाद |
| आकाश में बाणों का ऐसा जाल फैल गया मानो बादलों का समूह उमड़ पड़ा हो। इस कारण उस समय आकाश में उड़ने वाला कोई भी पक्षी कहीं उड़ नहीं सकता था। |
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| A net of arrows was spread in the sky as if a cloud of clouds had gathered there. Due to this, no bird flying in the sky could fly anywhere at that time. 54. |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १८८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें घमासान युद्धविषयक एक सौ अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८८॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं।) |
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