श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 180: घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  7.180.25-26h 
युद्धशौण्डो महाबाहुर्नित्योद्यतशरासन:।
केसरीव वने नर्दन् मातङ्ग इव यूथपान्॥ २५॥
विमदान् रथशार्दूलान् कुरुते रणमूर्धनि।
 
 
अनुवाद
महाबाहु कर्ण युद्ध में कुशल है। उसका धनुष सदैव उठा रहता है। वह वन में सिंह की भाँति सदैव दहाड़ता रहता है। जिस प्रकार मदमस्त हाथी अनेक सरदारों का अभिमान चूर कर देता है, उसी प्रकार कर्ण भी रणभूमि में सिंहों के समान पराक्रमी योद्धाओं का अभिमान चूर-चूर कर देता है।
 
Mahabahu Karna is skilled in war. His bow is always raised. He always roars like a roaring lion in the forest. Just like a drunken elephant makes many leaders lose their pride, in the same way Karna shatters the pride of mighty warriors like lions at the mouth of the battle.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)