श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम  »  श्लोक 93-94
 
 
श्लोक  7.175.93-94 
तलं तलेन संहत्य संदश्य दशनच्छदम्।
रथमास्थाय च पुनर्मायया निर्मितं तदा॥ ९३॥
युक्तं गजनिभैर्वाहै: पिशाचवदनै: खरै:।
स सूतमब्रवीत् क्रुद्ध: सूतपुत्राय मां वह॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
फिर वह अपने हाथों से हाथ मलता हुआ, दांतों से होंठ काटता हुआ, पुनः हाथियों के समान बलवान गधों से खींचे जाने वाले तथा राक्षसों के समान मुख वाले माया-निर्मित रथ पर बैठ गया और अपने सारथि से बोला, 'मुझे सारथिपुत्र कर्ण के पास ले चलो।'
 
Then he, rubbing his hands with his hands, biting his lips with his teeth, again sat in the Maya-made chariot drawn by strong donkeys like elephants and having faces like those of devils and said to his charioteer, 'Take me to Karna, the son of a charioteer.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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