श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम  »  श्लोक 67-68h
 
 
श्लोक  7.175.67-68h 
प्राह वाक्यमसम्भ्रान्त: सूतपुत्रं विशाम्पते।
तिष्ठेदानीं क्व मे जीवन् सूतपुत्र गमिष्यसि॥ ६७॥
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे।
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! अब घटोत्कच ने समस्त संशय से मुक्त होकर सारथिपुत्र कर्ण से कहा - "सारथिपुत्र! स्थिर रहो। अब यदि तुम मुझसे जीवित बचकर निकलोगे तो कहाँ जाओगे? आज मैं युद्धभूमि में तुम्हारे युद्ध करने के साहस को नष्ट कर दूँगा।"
 
Prajanath! Now Ghatotkacha, free from all doubts, said to charioteer's son Karna - 'Son of charioteer! Stand still. Now where will you go if you escape from me alive? Today I will destroy your courage to fight in the battlefield.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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