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श्लोक 7.175.67-68h  |
प्राह वाक्यमसम्भ्रान्त: सूतपुत्रं विशाम्पते।
तिष्ठेदानीं क्व मे जीवन् सूतपुत्र गमिष्यसि॥ ६७॥
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे। |
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| अनुवाद |
| प्रजानाथ! अब घटोत्कच ने समस्त संशय से मुक्त होकर सारथिपुत्र कर्ण से कहा - "सारथिपुत्र! स्थिर रहो। अब यदि तुम मुझसे जीवित बचकर निकलोगे तो कहाँ जाओगे? आज मैं युद्धभूमि में तुम्हारे युद्ध करने के साहस को नष्ट कर दूँगा।" |
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| Prajanath! Now Ghatotkacha, free from all doubts, said to charioteer's son Karna - 'Son of charioteer! Stand still. Now where will you go if you escape from me alive? Today I will destroy your courage to fight in the battlefield.' |
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