श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम  »  श्लोक 48-49h
 
 
श्लोक  7.175.48-49h 
घटोत्कचस्तु संक्रुद्धो दृष्ट्वा चक्रं निपातितम्॥ ४८॥
कर्णं प्राच्छादयद् बाणै: स्वर्भानुरिव भास्करम्।
 
 
अनुवाद
अपने चक्र को गिरा हुआ देखकर क्रोध में भरे हुए घटोत्कच ने कर्ण को अपने बाणों से ढक दिया, जैसे राहु सूर्य को ढक लेता है ॥48 1/2॥
 
Seeing his discus fallen, Ghatotkacha, filled with anger, covered Karna with his arrows, just as Rahu covers the Sun. ॥ 48 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)