vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 7: द्रोण पर्व
»
अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम
»
श्लोक 48-49h
श्लोक
7.175.48-49h
घटोत्कचस्तु संक्रुद्धो दृष्ट्वा चक्रं निपातितम्॥ ४८॥
कर्णं प्राच्छादयद् बाणै: स्वर्भानुरिव भास्करम्।
अनुवाद
अपने चक्र को गिरा हुआ देखकर क्रोध में भरे हुए घटोत्कच ने कर्ण को अपने बाणों से ढक दिया, जैसे राहु सूर्य को ढक लेता है ॥48 1/2॥
Seeing his discus fallen, Ghatotkacha, filled with anger, covered Karna with his arrows, just as Rahu covers the Sun. ॥ 48 1/2 ॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×