श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 170: धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्यका युद्ध, धृष्टद्युम्नद्वारा द्रुमसेनका वध, सात्यकि और कर्णका युद्ध, कर्णकी दुर्योधनको सलाह तथा शकुनिका पाण्डव-सेनापर आक्रमण  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  7.170.65 
देवानामिव देवेन्द्रे जयाशा त्वयि मे स्थिता।
जहि मातुल कौन्तेयानसुरानिव पावकि:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
‘चाचा! जिस प्रकार देवताओं की आशा देवराज इन्द्र पर टिकी है, उसी प्रकार मेरी विजय की आशा भी आप पर टिकी है। जिस प्रकार अग्निकुमार स्कन्द ने दैत्यों का संहार किया था, उसी प्रकार आप भी कुन्तीपुत्रों का संहार करें।’॥65॥
 
‘Uncle! Just as the hopes of the gods are pinned on Devraja Indra, similarly my hopes of victory are pinned on you. Just as Agnikumar Skanda killed the demons, in the same way you too should kill the sons of Kunti.'॥ 65॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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