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श्लोक 7.169.43-44h  |
सा निशा भरतश्रेष्ठ प्रदीपैरवभासिता॥ ४३॥
दिवसप्रतिमा राजन् बभूव रणमूर्धनि। |
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| अनुवाद |
| हे राजा भरतभूषण! दीपों से प्रकाशित वह रात्रि युद्ध के मुहाने पर दिन के समान हो गयी थी। |
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| O King Bharatbhushan! That night illuminated by lamps had become like day at the mouth of the battle. 43 1/2 |
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