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श्लोक 7.169.13  |
संक्रुद्ध: शकुनिं षष्टॺा विव्याध भरतर्षभ।
पुनश्चैनं शतेनैव नाराचानां स्तनान्तरे॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| हे भरतश्रेष्ठ! क्रोधित होकर उसने शकुनि को साठ बाणों से घायल कर दिया और फिर उसकी छाती में सौ बाण मारे। |
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| O best of the Bharatas! Enraged, he wounded Shakuni with sixty arrows. Then he shot a hundred arrows into his chest. |
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