श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 166: सात्यकिके द्वारा भूरिका वध, घटोत्कच और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा भीमके साथ दुर्योधनका युद्ध एवं दुर्योधनका पलायन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.166.4 
तावन्योन्यं महाराज ततक्षाते शरैर्भृशम्।
क्रोधसंरक्तनयनौ क्रोधाद् विस्फार्य कार्मुके॥ ४॥
 
 
अनुवाद
महाराज! दोनों की आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं। दोनों क्रोधपूर्वक धनुष खींच रहे थे और बाणों की वर्षा से एक-दूसरे को बुरी तरह घायल कर रहे थे।
 
Maharaj! The eyes of both of them were turning red with anger. Both of them were furiously drawing their bows and were severely injuring each other with a shower of arrows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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