अव्यग्रानेव हि परान् कथयस्यपराजितान्।
हृष्टानुदीर्णान् संग्रामे न तथा सूत मामकान्॥ १७॥
अनुवाद
सूत! आप मेरे शत्रुओं को तो अशान्त, अजेय, हर्ष और उत्साह से युक्त तथा युद्ध में शीघ्रता से आगे बढ़ते हुए बताते हैं; परन्तु मेरे पुत्रों की ऐसी स्थिति का वर्णन नहीं करते॥17॥
Suta! You describe my enemies as being restless, undefeated, full of joy and enthusiasm, and advancing swiftly in the battle; but you do not describe the same condition of my sons.॥ 17॥