| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 159: अश्वत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाञ्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध » श्लोक 88 |
|
| | | | श्लोक 7.159.88  | धिगस्तु मम लुब्धस्य यत्कृते सर्वबान्धवा:।
सुखार्हा: परमं दु:खं प्राप्नुवन्त्यपराजिता:॥ ८८॥ | | | | | | अनुवाद | | मुझ लोभी मनुष्य को धिक्कार है, जिसके कारण मेरे सभी भाई-बन्धु, जो किसी से पराजित नहीं हो सकते और सुख भोगने के अधिकारी हैं, इतने दुःख भोग रहे हैं ॥ 88॥ | | | | Shame on me, the greedy person, because of whom all my brothers and relatives, who can't be defeated by anyone and deserve to enjoy happiness, are suffering so much. ॥ 88॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|