श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 159: अश्वत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाञ्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  7.159.84 
मयि जीवति गान्धारे न युद्धं गन्तुमर्हसि।
मामनादृत्य कौरव्य तव नित्यं हितैषिणम्॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
गांधारीपुत्र! कुरुवंश के रत्न! मैं सदैव तुम्हारा कल्याण चाहती हूँ। मेरे जीते जी मेरा अनादर करके तुम्हें स्वयं युद्ध नहीं करना चाहिए। 84.
 
Gandhari's son! Jewel of the Kuru clan! I always wish well for you. You should not go to war yourself by disrespecting me while I am alive. 84.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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