श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 159: अश्वत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाञ्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.159.13 
दुर्योधन उवाच
अश्वत्थामन् प्रसीदस्व क्षन्तुमर्हसि मानद।
कोप: खलु न कर्तव्य: सूतपुत्रं कथंचन॥ १३॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन ने कहा- हे भाई अश्वत्थामा, जो दूसरों का आदर करते हो, प्रसन्न हो जाओ। तुम्हें मुझे क्षमा कर देना चाहिए। सारथीपुत्र कर्ण पर तुम्हारा क्रोध करना उचित नहीं है॥13॥
 
Duryodhan said- O brother Ashwatthama who respects others, be happy. You should forgive me. It is not right for you to be angry with Karna, the son of a charioteer.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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