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श्लोक 7.159.100  |
शक्तो ह्यसि महाबाहो दिव्येन स्वेन तेजसा।
निग्रहे पाण्डुपुत्राणां पञ्चालानां च मानद॥ १००॥ |
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| अनुवाद |
| हे पराक्रमी योद्धा, जो दूसरों का सम्मान करते हैं! आप अपने दिव्य तेज से पांचालों और पाण्डवों को वश में करने में समर्थ हैं ॥ 100॥ |
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| O mighty warrior who gives respect to others! You are capable of controlling the Panchalas and the Pandavas with your divine brilliance. ॥ 100॥ |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे दुर्योधनवाक्ये एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १५९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें दुर्योधनका वचनविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५९॥
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